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Mayawati की नज़र में BSP और SP एक समान – By RR

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मायावती की राजनीतिक समझ पर तो विरोधी भी प्रश्नचिन्ह नहीं लगाते हैं. लोकसभा चुनाव 2019 के रिजल्ट में जनता ने ऐसा फैसला सुनाया है, जिसके बाद विपक्षी दलों के लिए कुछ भी लिखने या समझने की ज्यादा गुंजाइश बची नहीं. फिर भी ये तो लोकतंत्र की राजनीति है, यहां जनता कभी भी रंक को राजा तो किसी राजा को रंक बना देती है. यूं तो लगभग पूरे देश में बीजेपी और उसके सहयोगियों ने मिलकर वोटों की लड़ाई में विरोधी खेमे को तहस-नहस करके रख दिया है, लेकिन उत्तर प्रदेश का रिजल्ट हरेक के लिए चौंकाने वाला है. दरअसल, यहां समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल ने मिलकर एक गठबंधन बनाया है, जो कागजों पर अभेद माना जा रहा था, लेकिन वास्तविक लड़ाई में यह पूरी तरह सफल साबित नही हुई. लेकिन इस फेल हुयी लड़ाई में भी मायावती विजेता बनकर उभरी है. वैसे इस गठबंधन में सीटों के बंटवारे और रिजल्ट का मूल्यांकन करने पर कई बातें साफ होती हैं. उत्तर प्रदेश की कुल 80 लोकसभा सीटों में से इस गठबंधन ने केवल 15 जीती हैं, जिसमें से 10 बहुजन समाज पार्टी और 5 समाजवादी पार्टी के खाते में आई हैं. आपको बता दें की 2014 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी अकेले लड़ी थी तब भी उसके पांच सांसद ही जीते थे. इस बार गठबंधन में लड़े तब भी उसके पांच सांसद ही जीते. दूसरी तरफ पिछले चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का स्कोर शून्य था. इस बार गठबंधन की वजह से उसके खाते में 10 लोकसभा सीटें आई हैं. इस हिसाब से देखें तो BSP पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार फायदे में रही है. ऐसे में जेहन में सवाल उठना लाजमी है कि आखिर गठबंधन में SP 5 और BSP 10 सीटें क्यों जीतीं. आइए इसके मायने समझें. दरअसल अखिलेश पिछले चुनावों में हार को देखकर यह समझ चुके थे की..अगर राजनीति में टिके रहना है तो उन्हें मायावती के साथ गठबंधन करना ही पड़ेगा. गठबंधन बनने के बाद सीटों के बंटवारे में मायावती की हिस्से में ज्यादातर सीटें ग्रामीण हिस्से की आई….जबकि सपा के हिस्से में बहुत ज्यादा शहरी सीटें थी. इन शहरी सीटों पर भाजपा हमेशा ही अच्छा प्रदर्शन करती रही है. इसलिए सपा तो आधी लड़ाई चुनाव लड़ने के पहले ही हार चुकी थी…जबकि बसपा के ज्यादातर समर्थक इसी इलाके में है. इसलिए चुनाव में बसपा को बड़ी जीत मिली जबकि सपा मात्र 5 सीटों पर जीती. राजनीति के जानकार मानते हैं की अगर यह गठबंधन आगे भी बना रहता है….और इसी तरह से सीटों का बंटवारा करते हैं तो BSP को ज्यादा फायदा होता रहेगा. निश्चित रूप से यह गठबंधन BSP के लिए ज्यादा फायदेमंद है. हालांकि इस जीत हार से मायावती के इरादों पर शक नहीं किया जा सकता. इन्होने हर सीट पर समान मेहनत किया….चाहें उस पर बसपा के उम्मीदवार हों या सपा के. वैसे कई सपा समर्थकों को लग रहा है की मायावती की समझदारी अखिलेश पर भारी पड़ गयी है…पर सच्चाई यह है की ये मात्र संयोग है की जनता ने अखिलेश की तुलना में मायावती को ज्यादा पसंद किया.

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